तेंदूखेड़ा । जो संयम में खडा है वही सबसे बडा है ,मुनि श्री आस्तिक्य सागर जी महाराज

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तेंदूखेड़ा – आज मनुष्य साधनों की रंगीन दुनिया  मे इतना रम गया है कि सधना  को भूला गया है , भौतिक सुख सविधाओ के साधन जुटाने में सारी उमर निकली जा रही है संयम साधना से कोसों दूर है, वालों में तो सफेदी आ गयी है परन्तु वस्त्रों में सफेदी नहीं आई है, संयम साधना विहीन जीवन दीमक लगे वृक्ष के समान होता है कब धराशायी हो जाये इसका कोई भरोसा नहीं है, यह मानव रुपया पैसा, धन दौलत, कोठी बंगलों, इज्जत शोहरत से अपने को बडा मानता है परंतु सत्य तो यह है कि जो संयम में खडा है वही सबसे वडा है उक्ताशय के उद्गार चर्या शिरोमणि आचार्य 108 श्री विशुद्ध सागर जी महाराज के परम शिष्य मुनि श्री आस्तिक्य सागर जी महाराज ने जैन मंदिर में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुये धर्मसभा में व्यक्त किये,  संत शिरोमणि आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी महाराज के ईसवी सन् के अनुसार 18 फरवरी को प्रथम समाधि स्मृति दिवस पर अपनी भावांजलि व्यक्त करते हुये संघस्थ  मुनि श्री प्रणीत सागर जी महाराज ने कहा कि साधु जीवन के छह सोपान हुआ करते हैं, दीक्षा काल, शिक्षाकाल, गणपोषणकाल, आत्मसाधना काल, सल्लेखना काल, और उत्तमार्थकाल, आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का जीवन इन छहों सोपानों की कसौटी पर खरा रहा है, आज आवश्यकता है आचार्य श्री के कृतित्व को विश्व के कौने कौने तक प्रसारित करने की तभी हम आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सच्चे भक्त, कहला सकते हैं, एक वार आचार्य श्री के दर्शन किये थे जिसका महान फल मुझे ये मिला की मेरे हाथों में भी पिच्छी कमंडल आ गया में भी विद्यासागर जैसा दिगंबर वन गया। इसके पूर्व प्रात: 8 वजे तेंदूखेडा नगर में द्वव  युगल मुनियों (गृहस्थावस्था के सगे जुडवा भाई ) श्री108 मुनि श्री प्रणीत सागर महाराज जी एवं 108 मुनि श्री आस्तिक्य सागर जी महाराज का शुभागमन हुआ समाज जनों नेभव्य मंगल आगवानी की, ब्रम्हचारी विजय भैयाजी का भी सान्निध्य प्राप्त हुआ, भैयाजी ने भी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के प्रति अपनी भावांजलि व। व्यक्त की कार्यक्रम का संचालन पं कमल कुमार शास्त्री एवं महीष मोदी ने किया। संध्या वेला में 1008  दीप प्रज्ज्वलित करके महारती की गई।

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