ललितपुर । स्टेट की तरफ से भाग लिया था जैसा नाम वैसा काम वाली कहावत को चरितार्थ करने वाले उस गुमनाम वीर योद्धा का नाम जंग बहादुर सिंह परमार था।जंग बहादुर सिंह परमार के पूर्वज करैरा के जौहरिया शाखा से संबंध रखते थे
1469 ई में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने करैरा पर बड़ा आक्रमण किया था जिसमें हजारों की संख्या में परमार वीरों ने बलिदान दिया था परमार वीरांगनाओ ने भी अपने आत्मसम्मान और सतीत्व की रक्षा हेतु बड़े पैमाने पर युद्ध में ज़ौहर किया
ताकि शत्रु उनकी देह को छू भी न सकें।

कटीली गांव दिनारा – झांसी मार्ग से कुछ अंदर स्थित है जो अब दतिया जिले में स्थित है और झांसी से लगभग 20 किमी दूरी पर है।
जंग बहादुर सिंह परमार के पूर्वज पवाया से करैरा फिर उदगुंवा होते हुए कटीली में आए जंग बहादुर सिंह परमार झांसी स्टेट के प्रधान सेनापति जवाहर सिंह परमार के परिवार से थे इसी परिवार ने 1857 की गदर में अंग्रेजों के विरुद्ध बड़ी कीमत चुकाई थी और अपना सर्वस्व न्यौछावर किया था।
6 जून 1857 को करैरा क्षेत्र के परमार व अन्य विद्रोही जिनमें जंग बहादुर सिंह भी शामिल थे अपने सैनिकों के साथ झांसी आ गए इन विद्रोहियों की संख्या लगभग पांच सौ थी कई अन्य विद्रोही भी झांसी आ गए और सभी ने संयुक्त रूप से झांसी के किले को घेर लिया किले को घेरने का कारण यह था झांसी में रह रहे सभी अंग्रेज अधिकारी कर्मचारी अपने बच्चों सहित झांसी के किले में पहुंच गए थे।
झांसी के किले की खिड़की से झांक रहे कैप्टन गार्डन को जंग बहादुर सिंह ने देख लिया निशाना साध कर जंग बहादुर सिंह ने गोलियां चला दीं परिणाम स्वरूप कैप्टन गार्डन का काम तमाम हो गया,
बाद में विद्रोहियों ने 8 जून झोकन बाग में नरसंहार की घटना को अंजाम दिया इसी घटनाक्रम के बाद परिस्थितियां बदलीं और विद्रोहियों ने रानी लक्ष्मीबाई जू को झांसी की रानी मानते हुए घोषणा कर दी।
12 जून 1857 को रानी लक्ष्मीबाई जू झांसी की रानी बनी और उन्हौने अपने मंत्रिमंडल का गठन करते हुए जवाहर सिंह परमार को प्रधान सेनापति बनाया
जवाहर सिंह ने अपनी सेना में एक से एक वीर योद्धाओं को जंग बहादुर सिंह सहित शामिल किया (इन वीर योद्धाओं का विवरण फिर कभी )
अंग्रेजों की सैन्य शक्ति की अपेक्षा झांसी स्टेट के पास सैन्य ताकत और हथियारों का जखीरा उतना नहीं था
लेकिन झांसी स्टेट की रानी लक्ष्मीबाई जू और उनकी सेना के रणबांकुरे मातृभूमि पर मर मिटने के लिए तैयार थे।
सर ह्यूरोज ने अंततः 23 मार्च 1858 को झांसी पर आक्रमण किया इस आक्रमण में कुंवर जंग बहादुर सिंह बड़ी बहादुरी से लड़े।
2 अप्रैल 1858 के युद्ध में अंग्रेजों को भारी छति पहुंचाकर मेंहदी बाग में युद्धरत कुंवर जंग बहादुर सिंह परमार कटीली वीर गति को प्राप्त हुए और इस प्रकार एक युवा योद्धा अपनी मातृभूमि पर शहीद हो गया।
आज 2 अप्रैल को जंग बहादूर सिंह परमार कटीली वालों के बलिदान दिवस पर कोटि कोटि नमन 🙏
साभार
बुंदेलखंड का गौरवशाली इतिहास
अनुज सिंह ठाकुर ब्यूरो रिपोर्ट ललितपुर

