ललितपुर lआज 2 अप्रैल को एक ऐसे गुमनाम योद्धा का बलिदान दिवस है जिसने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों के विरुद्ध झांसी

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ललितपुर । स्टेट की तरफ से भाग लिया था जैसा नाम वैसा काम वाली कहावत को चरितार्थ करने वाले उस गुमनाम वीर योद्धा का नाम जंग बहादुर सिंह परमार था।जंग बहादुर सिंह परमार के पूर्वज करैरा के जौहरिया शाखा से संबंध रखते थे
1469 ई में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी ने करैरा पर बड़ा आक्रमण किया था जिसमें हजारों की संख्या में परमार वीरों ने बलिदान दिया था परमार वीरांगनाओ ने भी अपने आत्मसम्मान और सतीत्व की रक्षा हेतु बड़े पैमाने पर युद्ध में ज़ौहर किया
ताकि शत्रु उनकी देह को छू भी न सकें।

कटीली गांव दिनारा – झांसी मार्ग से कुछ अंदर स्थित है जो अब दतिया जिले में स्थित है और झांसी से लगभग 20 किमी दूरी पर है।

जंग बहादुर सिंह परमार के पूर्वज पवाया से करैरा फिर उदगुंवा होते हुए कटीली में आए जंग बहादुर सिंह परमार झांसी स्टेट के प्रधान सेनापति जवाहर सिंह परमार के परिवार से थे इसी परिवार ने 1857 की गदर में अंग्रेजों के विरुद्ध बड़ी कीमत चुकाई थी और अपना सर्वस्व न्यौछावर किया था।

6 जून 1857 को करैरा क्षेत्र के परमार व अन्य विद्रोही जिनमें जंग बहादुर सिंह भी शामिल थे अपने सैनिकों के साथ झांसी आ गए इन विद्रोहियों की संख्या लगभग पांच सौ थी कई अन्य विद्रोही भी झांसी आ गए और सभी ने संयुक्त रूप से झांसी के किले को घेर लिया किले को घेरने का कारण यह था झांसी में रह रहे सभी अंग्रेज अधिकारी कर्मचारी अपने बच्चों सहित झांसी के किले में पहुंच गए थे।

झांसी के किले की खिड़की से झांक रहे कैप्टन गार्डन को जंग बहादुर सिंह ने देख लिया निशाना साध कर जंग बहादुर सिंह ने गोलियां चला दीं परिणाम स्वरूप कैप्टन गार्डन का काम तमाम हो गया,
बाद में विद्रोहियों ने 8 जून झोकन बाग में नरसंहार की घटना को अंजाम दिया इसी घटनाक्रम के बाद परिस्थितियां बदलीं और विद्रोहियों ने रानी लक्ष्मीबाई जू को झांसी की रानी मानते हुए घोषणा कर दी।

12 जून 1857 को रानी लक्ष्मीबाई जू झांसी की रानी बनी और उन्हौने अपने मंत्रिमंडल का गठन करते हुए जवाहर सिंह परमार को प्रधान सेनापति बनाया
जवाहर सिंह ने अपनी सेना में एक से एक वीर योद्धाओं को जंग बहादुर सिंह सहित शामिल किया (इन वीर योद्धाओं का विवरण फिर कभी )

अंग्रेजों की सैन्य शक्ति की अपेक्षा झांसी स्टेट के पास सैन्य ताकत और हथियारों का जखीरा उतना नहीं था
लेकिन झांसी स्टेट की रानी लक्ष्मीबाई जू और उनकी सेना के रणबांकुरे मातृभूमि पर मर मिटने के लिए तैयार थे।

सर ह्यूरोज ने अंततः 23 मार्च 1858 को झांसी पर आक्रमण किया इस आक्रमण में कुंवर जंग बहादुर सिंह बड़ी बहादुरी से लड़े।
2 अप्रैल 1858 के युद्ध में अंग्रेजों को भारी छति पहुंचाकर मेंहदी बाग में युद्धरत कुंवर जंग बहादुर सिंह परमार कटीली वीर गति को प्राप्त हुए और इस प्रकार एक युवा योद्धा अपनी मातृभूमि पर शहीद हो गया।

आज 2 अप्रैल को जंग बहादूर सिंह परमार कटीली वालों के बलिदान दिवस पर कोटि कोटि नमन 🙏
साभार
बुंदेलखंड का गौरवशाली इतिहास

अनुज सिंह ठाकुर ब्यूरो रिपोर्ट ललितपुर

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*कुंभकरण की नींद बड़ी या जल संसाधन विभाग की लापरवाही और हठ* *पर्वत सिंह राजपूत* रायसेन/वर्तमान समय में गेहूं की फसल के लिए खेत खाली हैं और गेहूं बुबाई हेतु खेतों की जुताई चालू है परंतु जो किसान डैम और नहरों पर निर्भर हैं उनके सामने गेहूं की फसल बोने की समस्या उत्पन्न होने वाली है क्योंकि डैमो से निकलने वाली नहर से खेतों तक पानी पहुंचता है वो नहरें जर्जर अवस्था में पड़ी है ! जबकि इस मामले में पिछले कई महीनो में कई बार रायसेन कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा जी ने भी विभाग को निर्देशित किया था कि किसानों को पर्याप्त पानी मिले इसके लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं की जाए परंतु लगता है जल संसाधन विभाग कलेक्टर से बड़ा हो गया है क्योंकि अभी तक नहरों की साफ सफाई नहीं हुई है जिससे कि किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाया जा सके। चाहे वह अमरावद डैम हो चाहे बनछोड़ डैम हो चाहे सोडारा डैम हो सभी डेमो के नहरों की हालत खराब है! एक दो जगह देखने में आया है नहरों मे साफ सफाई कराई जा रही है जबकि कई नहरे और उनके ऊपर अंडर पास ऐसे हैं जो टूटे हुए हैं और उनसे पानी लीकेज हो रहा है जबकि 1 नवंबर तक डैम के द्वारा नहरों को दुरुस्त करके पानी की सप्लाई शुरू हो जानी चाहिए थी लेकिन जल संसाधन विभाग की लापरवाही की वजह से अभी तक नहरों में पानी सप्लाई नहीं हो सका है। ना तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित एसडीओ लेने को तैयार है और ना ही जल संसाधन अधिकारी।जब जिला मुख्यालय पर जल संसाधन विभाग के अधिकारियों की ऐसी उदासीनता देखने को मिल रही है और नहरों के यह हाल है तो सोच सकते हैं कि पूरे जिले की स्थिति क्या होगी। जबकि नहरों की शिकायतों हेतु विभाग से लेकर कलेक्टर तक किसानों ने शिकायत की है और कई जगह 181 पर शिकायत की गई है! परंतु मजबूर और परेशान किसानों की सुनने वाला शायद कोई नहीं।