कभी सत्ता बदलने का दम रखने वाला प्याज, अब बिगाड़ रहा घर का बजट

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प्याज के बढ़ते दामों ने निकाले आम आदमी के आंसू!
         कभी प्याज काटकर आंखें रोती थीं,
        अब प्याज खरीदकर जेब रोती है।
        कभी सब्जी का स्वाद बढ़ाता था प्याज,
        अब बजट बिगाडक़र सुर्खियां बटोरता है!
बीना (टीएमई न्यूज)। प्याज के बढ़ते दाम आम आदमी की रसोई का जायका बिगाडऩे लगे हैं। कभी सब्जियों की टोकरी में आसानी से जगह पाने वाला प्याज अब खरीदारी से पहले जेब का हिसाब लगाने पर मजबूर कर रहा है। हालात ऐसे हैं कि प्याज काटते समय आंखों से निकलने वाले आंसुओं की कहावत अब बदलती नजर आ रही है। पहले प्याज छीलने और काटने पर आंसू आते थे, अब प्याज खरीदने की कीमत सुनकर ही आंखें नम होने लगी हैं।
प्याज की खासियत भी कम निराली नहीं है। दाल-सब्जी हो या सलाद, समोसे-कचौड़ी हों या चटपटा नाश्ता—प्याज हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज कराता है। लेकिन जब इसी प्याज के दाम बढ़ते हैं, तो उसका असर सीधे रसोई के बजट पर पड़ता है। गृहिणियां सब्जी में प्याज की मात्रा कम करने, सलाद की प्लेट से उसे हटाने और खरीदारी के दौरान दूसरी सस्ती सब्जियों को प्राथमिकता देने पर विचार करने लगती हैं।
प्याज का पुराना राजनीतिक इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं
भारतीय राजनीति में प्याज केवल रसोई का स्वाद बढ़ाने वाली सब्जी नहीं रहा, बल्कि कई बार महंगाई और जनाक्रोश का प्रतीक भी बना है। वर्ष 1998 में दिल्ली सहित कुछ राज्यों में प्याज की आसमान छूती कीमतें चुनावी मुद्दा बनी थीं। उस समय प्याज की महंगाई को दिल्ली विधानसभा चुनाव में भाजपा की हार और कांग्रेस की जीत के प्रमुख कारणों में गिना गया था। यह घटना आज भी इस बात की याद दिलाती है कि आम आदमी की थाली से जुड़ी चीजों के दाम राजनीति पर भी असर डाल सकते हैं।
प्याज महंगा, तो घर का गणित गड़बड़!
महंगाई की मार झेल रहे परिवारों के लिए प्याज के दाम बढऩा भले ही छोटी बात लगे, लेकिन महीने भर के घरेलू खर्च में हर वस्तु की कीमत मायने रखती है। रसोई का बजट पहले ही तेल, दाल, आटा और अन्य सब्जियों के खर्च से दबाव में हो, तो प्याज की बढ़ी कीमतें परेशानी और बढ़ा देती हैं। प्याज के दाम बढऩे पर आम आदमी के मन में यही सवाल उठता है कि आखिर रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च कब काबू में आएगा? प्याज की कीमतों में उतार-चढ़ाव के पीछे मौसम, उत्पादन, भंडारण, परिवहन और आपूर्ति जैसे कई कारण हो सकते हैं। इसलिए उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बाजार में पर्याप्त आपूर्ति और कीमतों पर प्रभावी निगरानी जरूरी है।
आखिर में बस इतनी-सी बात—प्याज की कीमतें चाहे बाजार तय करे, लेकिन आम आदमी की उम्मीद यही है कि उसकी थाली से स्वाद और जेब से सुकून दोनों गायब न हों। क्योंकि प्याज की महंगाई का असर केवल रसोई तक सीमित नहीं रहता, कभी-कभी उसकी गूंज सत्ता के गलियारों तक भी पहुंच जाती है।
कभी सत्ता परिवर्तन कराने वाली प्याज ने फिर दिखाये अपने तेवर
गौरझामर (टीएमई न्यूज)। भोजन की थाली में जायका बढ़ाने वाली और कभी सरकार को सत्ता से उखाड़ फेकने वाली प्याज ने चुनावो के नजदीक आते ही फिर से अपने तेवर दिखाने शुरु कर दिये है गौरझामर की सब्जी मार्केट व बुधवारा इतवारा हाट बाजार में इस समय प्याज सबसे मंहगे दामों में बिक रही है अन्य सब्जियो के मुकाबले प्याज का रेट लगभग दोगुना है इस समय भोजन की थाली का स्वाद बढाने वाली प्याज ने भी अपना जलवा फिर से दिखा दिया है प्याज के बढे दामो के कारण गरीब व सामान्य वर्ग के लोगो मे सरकार के प्रति असंतोष सातवें आसमान पर पहुंच गया है लोगों का कहना है कि जब सरकार सब्जियो के भाव नियंत्रण में रखने में असमर्थ है तब ऐसी सरकार का सत्ता में बने रहने का क्या काम है प्याज ने आज आम आदमी को प्याज के आंसु रुला दिया है समय रहते यदि सरकार प्याज के दाम कम नही करती है तो लोगो का आक्रोश बेलट पेपर पर फिर दिखाई देने वाला है।

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