चिकित्सा उपकरण क्षेत्र ने केंद्र के ₹500 करोड़ के आवंटन का किया स्वागत

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केंद्र सरकार द्वारा चिकित्सा उपकरण उद्योग को मजबूती देने के लिए ₹500 करोड़ का आवंटन किए जाने के बावजूद, भारत में चिकित्सा उपकरण निर्माण क्षेत्र को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। केमिकल्स और उर्वरक मंत्री जे.पी. नड्डा ने हाल ही में केंद्रीय योजना “चिकित्सा उपकरण उद्योग को सुदृढ़ करने” की शुरुआत करते हुए यह स्वीकार किया कि सबसे बड़ी चुनौती इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है।

इस योजना का उद्योग ने स्वागत किया है, जिसमें सरकार ने ₹500 करोड़ का कुल आवंटन किया है। मंत्रालय ने कहा, “यह समग्र योजना चिकित्सा उपकरण उद्योग के महत्वपूर्ण क्षेत्रों को लक्षित करती है, जिसमें प्रमुख घटकों और सहायक उपकरणों का निर्माण, कौशल विकास, नैदानिक अध्यानों का समर्थन, सामान्य बुनियादी ढांचे का विकास और उद्योग को बढ़ावा देना शामिल है।”

केंद्र सरकार ने इसे “गेम चेंजर” बताते हुए कहा कि यह न केवल उद्योग की मदद करेगा, बल्कि भारत को आत्मनिर्भर बनाने में भी मदद करेगा। चिकित्सा उपकरण उद्योग स्वास्थ्य देखभाल के क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। डायग्नोस्टिक मशीनों से लेकर सर्जिकल उपकरणों, स्टेंट से लेकर प्रॉस्थेटिक्स तक, चिकित्सा उपकरण रोगों की रोकथाम, निदान और उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मंत्रालय के अनुसार, भारत का चिकित्सा उपकरण बाजार लगभग $14 बिलियन का है और 2030 तक यह $30 बिलियन तक पहुंचने का अनुमान है।

इस घोषणा का स्वागत करते हुए, पॉलि मेडिक्योर के प्रबंध निदेशक हिमांशु बयद ने कहा कि चिकित्सा उपकरणों के लिए यह नई योजना भारत के मेडटेक क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, जो न केवल वृद्धि को बढ़ावा देगी, बल्कि निर्यात क्षमता को भी सुदृढ़ करेगी।

उन्होंने कहा, “चिकित्सा उपकरण क्लस्टरों के लिए सामान्य सुविधाओं की पहचान जैसे प्रमुख उपाय सहयोग, नवाचार और लागत दक्षता को बढ़ावा देंगे। क्षमता निर्माण और कौशल विकास कार्यक्रमों का उद्देश्य प्रतिभा अंतराल को पाटना है, जिससे उच्च मानक के निर्माण और नैदानिक विशेषज्ञता सुनिश्चित हो सके।”

उन्होंने यह भी कहा कि चिकित्सा उपकरणों के नैदानिक अध्ययन समर्थन योजना उच्च गुणवत्ता वाले, वैश्विक प्रतिस्पर्धी उत्पादों के विकास को बढ़ावा देगी, जिससे भारत की अंतरराष्ट्रीय बाजारों में उपस्थिति मजबूत होगी, जबकि आयात निर्भरता को कम करने के लिए योजनाबद्ध निवेश घरेलू निर्माण को बढ़ावा देगा, आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देगा और आयात लागत को कम करेगा।

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*कुंभकरण की नींद बड़ी या जल संसाधन विभाग की लापरवाही और हठ* *पर्वत सिंह राजपूत* रायसेन/वर्तमान समय में गेहूं की फसल के लिए खेत खाली हैं और गेहूं बुबाई हेतु खेतों की जुताई चालू है परंतु जो किसान डैम और नहरों पर निर्भर हैं उनके सामने गेहूं की फसल बोने की समस्या उत्पन्न होने वाली है क्योंकि डैमो से निकलने वाली नहर से खेतों तक पानी पहुंचता है वो नहरें जर्जर अवस्था में पड़ी है ! जबकि इस मामले में पिछले कई महीनो में कई बार रायसेन कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा जी ने भी विभाग को निर्देशित किया था कि किसानों को पर्याप्त पानी मिले इसके लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं की जाए परंतु लगता है जल संसाधन विभाग कलेक्टर से बड़ा हो गया है क्योंकि अभी तक नहरों की साफ सफाई नहीं हुई है जिससे कि किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाया जा सके। चाहे वह अमरावद डैम हो चाहे बनछोड़ डैम हो चाहे सोडारा डैम हो सभी डेमो के नहरों की हालत खराब है! एक दो जगह देखने में आया है नहरों मे साफ सफाई कराई जा रही है जबकि कई नहरे और उनके ऊपर अंडर पास ऐसे हैं जो टूटे हुए हैं और उनसे पानी लीकेज हो रहा है जबकि 1 नवंबर तक डैम के द्वारा नहरों को दुरुस्त करके पानी की सप्लाई शुरू हो जानी चाहिए थी लेकिन जल संसाधन विभाग की लापरवाही की वजह से अभी तक नहरों में पानी सप्लाई नहीं हो सका है। ना तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित एसडीओ लेने को तैयार है और ना ही जल संसाधन अधिकारी।जब जिला मुख्यालय पर जल संसाधन विभाग के अधिकारियों की ऐसी उदासीनता देखने को मिल रही है और नहरों के यह हाल है तो सोच सकते हैं कि पूरे जिले की स्थिति क्या होगी। जबकि नहरों की शिकायतों हेतु विभाग से लेकर कलेक्टर तक किसानों ने शिकायत की है और कई जगह 181 पर शिकायत की गई है! परंतु मजबूर और परेशान किसानों की सुनने वाला शायद कोई नहीं।