मध्य प्रदेश के सुसनेर के 72 वर्षीय जैन संत आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का समाधि मरण
धामनोद /धार से दीपक प्रधान की रिपोर्ट
मध्य प्रदेश के 72 वर्षीय प्रतिष्ठित जैन संत आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का समाधि मरण 1 दिसंबर को शाम 5:00 बजे के लगभग हो गया डोला 2 दिसंबर सुबह 8:00 बजे निकल गया धाम आचार्य श्री ने अपने जीवन में 188 पंचकल्याणक महोत्सव को आयोजन किया और 47 वर्षों की साधना में 2 लाख किलोमीटर की पदयात्रा की उनका जीवन न केवल जैन धर्म के प्रति समर्पण और तपस्या का प्रतीक था बल्कि उन्होंने समाज में भी धर्म और संस्कारों के प्रचार-प्रसार के लिए अपार योगदान दिया आचार्य दर्शन सागर जी महाराज काउन्होंने समाज में धर्म और संस्कारों के प्रचार प्रसार के लिए अपना योगदान दिया आचार्य श्री ने सुसनेरके दिगंबरजैन समाज को एक सूत्र में बांधने का कार्य किया और सुसनेर के इंदौर कोटा मार्ग पर त्रिमूर्ति मंदिर का निर्माण कर समाज को धर्म से जोड़ा उनकी शिक्षा मार्गदर्शन और उपदेशों ने समाज को सच्चे अर्थों में एकजुट किया आचार्य श्री का जीवन एक तपस्वी यात्रा आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज के जीवन में धर्म और तपस्या का महत्वपूर्ण स्थान रहा उनके सानिध्य में सुसनेर में आयोजित पंचकल्याणक महोत्सव हर वर्ष एक भव्य आयोजन बनता रहा उन्होंने इंसाफ प्रमुख धर्म का संदेश देते हुए समाज में जैन धर्म के प्रति निष्ठा और भक्ति का प्रचार किया उनके सानिध्य में सुसनेर के189 वह पंचकल्याणक महोत्सव23 जनवरी से 30 जनवरी तक आयोजित किया जाना था करीब 2 लाख किलोमीटर की पद यात्रा के दौरान आचार्य श्री ने समाज जनों को केवल धर्म का अनुसरण करने की शिक्षा दी यही कारण है कि सुसनेर का जैन समाज हर्ष होने वाले कार्य को आचार्य श्री के शांति में ही करता आ रहा है आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का जन्म 13 अगस्त 1947 को दिल्ली में हुआ था उनके पिताजी का नाम श्री सूरजभान जी जैन और माता जी का नाम श्रीमती रतन माला जी जैन था आचार्य श्री ने 21 फरवरी 1972 को तिजारा राजस्थान में आचार्य श्री 108 निर्मल सागर जी महाराज जी से ब्रह्मचर्य व्रत लिया और गुरु के साहित्य में 9 अप्रैल 1972 को तिजारा में क्षुल्लकदीक्षा प्राप्त की इसके बाद 13 मार्च 1973 को उन्होंने बूंदी राजस्थान में मुनि दीक्षा ली 13 अप्रैल 1973 को गणधर पद सांगोद राजस्थान में मिला इसके बाद आचार्य श्री निर्मल सागर जी महाराज से दीक्षा लेकर 11 फरवरी 1984 को अगर उत्तर प्रदेश में आचार्य पद की पदवी प्राप्त की यह उपाधि आचार्य श्री सुनती सागर जी महाराज ने प्रदान की दीक्षा के पश्चात उनके नाम आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज रखा गया आचार्य श्री के जीवन में विशेषता उनकी सरलता और संस्था थी जिनके कारण समाज के हर वर्ग में लोग उनके परम भक्त बन गए उनकी शिक्षा और गुना को शब्दों में व्यक्त करना कठिन है क्योंकि उनके जीवन का प्रत्येक पहले एक प्रेरणा है धर्म के प्रति प्रतिबद्धता 25 चातुर्मास सुसनेर में आचार्य श्री ने अपने जीवन में 25 चातुर्मास सुसनेरमें ही किया जिनमें से कुछ चतुर्भुज दिल्ली इंदौर कोटा बूंदी निवाई अजमेर और उज्जैन में भी किया फिर उन्होंने सुसनेर को अपनी स्थाई साधना स्थली बनाए रखा और यहां पर सबसे अधिक चातुर्मास किया 38 दीक्षाएं और तीन आर्यिका माताजी आचार्य श्री ने अपने 47 वर्षों के जीवन में 38 दीक्षाएं दी जिसमें 16 मुनि बीच 16 और तीन आर्यिकामाताजी शामिल है उनकी सरलता और संस्था के कारण समाज का हर वर्ग हर व्यक्ति उन्हें विशेष परम भक्त मानता है मनी पूज्य सागर जी की प्रेरणा से दिगंबर अवस्था में समाधि मरण आचार्य श्री दर्शन सागर जी महाराज का स्वास्थ्य पिछले 4 वर्षों से अस्वस्थ थेऔर उनकी सेवासमाज द्वारा गृहस्थ अवस्था में की जा रही थी पिछले दो महीना से उन्हें नवग्रह अतिशय क्षेत्र ग्रेटर बाबा परिसर इंदौर में लाकर चिकित्सा दी गई गुरु भक्त नरेंद्र वेद उन्हें वहां लेकर आए और वहीं सेवाएं कर रहे थे आचार्य श्री 22 नंबर से कुछ भी नहीं ले पा रहे थे यहां तक की एक या दो गुट पानी भी नहीं पिया जा रहा था तब नवग्रह अति से क्षेत्र में विराजमान अंतर्मुखी मनीश्री पूज्यसागर जी महाराज ने इंदौर में जैन समाज संसद के अध्यक्ष नरेंद्र वेद और सुसनेर के अध्यक्ष और समाज जनों को निर्देशित किया कि भगवान के सामने गुरुदेव के वस्त्र उतार कर उनके पीछे कमंडल रखकर उन्हें दीक्षा दी जाए ताकि वह दिगंबर मुनि बनाकर जीवन भर त्याग तपस्या और मार्ग पर चलते हुए यह धार्मिक के लिए अपना जीवन समर्पित कर सके इसी दीक्षा के बाद पूर्व चारों को समाधि भरण दिगंबर अवस्था में ही हो ताकि उनके जीवन भर की तपस्या सफल हो सके इसके बाद 28 नंबर को नरेंद्र वेद के द्वारा सुसनेर ले जाया गया जब 29 नवंबर को आचार्य श्री दर्शन तेजाजी महाराज ने भगवान के सामने मुनि रूप में दीक्षा ली और आज 1 दिसंबर को उनका समाधि मरण हो गया दिगंबर जैन समाज धामनोद सहित अन्य समाज जनों ने भी उनके समाधि मरण पर अपनी भवन जली अर्पित की


