पवई ।चैत्र नवरात्रि के पहले दिन शैलपुत्री के रूप में हुई मां कलेही की उपासना प्रदेश ही नहीं देशभर से श्रद्धालु आते हैं दर्शन करनेहोती है मनोकामनाएं पूरी

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पवई ।नगायच परिवार की है कुलदेवी*
देश भर में शक्ति स्वरूपा जगत जननी के अनेक मंदिर हैं,जहां माता विभिन्न रूपों में विराजमान है ऐसा ही एक मंदिर बुंदेलखंड के पन्ना जिले के पवई में स्थित है जो पूरे बुंदेलखंड ही नहीं अपितु देश भर में प्रसिद्ध है
ऐसा ही एक मंदिर है जो विंध्य पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसे पन्ना जिले की पवई में है,जिसका नाम जुबां पर आता है,तो जेहन में दिव्य शक्ति मां काली का दिव्य दर्शन सामने आता है,वैसे तो शक्ति स्वरुपा नारायणी के अनेक रूप हैं,जो देश भर के अलग-अलग स्थान पर शक्तिपीठ के रूप में विद्वान है| जहां चैत्र नवरात्रि के पहले दिन माता की शैलपुत्री के रूप में उपासना की जा रही है सुबह से ही लोग माता के जलार्पित करने और दर्शन करने के लिए पहुंच रहे हैं।
दुर्गा सप्तशती में वर्णित नव देवियों में मां कलेही सप्तम देवी कालरात्रि ही है,अष्टभुजाओं में शंख चक्र,गदा,तलवार तथा त्रिशूल उनके आंठो हाथों में है,पैर के नीचे भगवान शिव है,उनके दाएं भाग में हनुमान जी तथा बाय भाग में बटुक भैरव विराजमान है | मां हाथ में भाला लिए महिषासुर का वध कर रही है | यह विलक्षण प्रतिमा 14 -16 शताब्दी की चंदेल कालीन है |
मां कलेही पवई नगर से दो किलोमीटर की दूरी पर पतने नदी के तट पर विराजमान है इस स्थान की छटा बड़ी मनोरम है।

यहां सम्पूर्ण भारत के सभी अंचलों बुन्देलखण्ड, बघेलखण्ड,मालवा,निमाड़ आदि से मां के दर्शनों के लिए लोग आते हैं
प्राचीन समय से अनवरत चली आ रही मां कलेही में भक्तों की आस्था आज भी कायम है। इस तथ्य का प्रमाण मंदिर परिक्रमा में लालचुनरी में बंधे हुये हजारों श्रीफल है। यहां भक्त अपनी मन्नते लेकर आते हैं और सच्चे मन से मां कलेही की आराधना करके श्रीफल को लालचुनरी में लपेट कर बांध देते हैं तथा मन्नत पूर्ण होने पर श्रीफल को छोड़कर मनोकामना पूर्ण होने का शुभ संकेत देते हैं। नवरात्रि में यहां कन्या भोज कराने वालों की मनोकामनायें अवश्य पूर्ण होती हैं। श्रद्धालु यदि सच्ची श्रद्धा एवं भाव से मां कलेही की परिक्रमा पूर्ण करता है तो भी मां भक्त की पुकार सुनती है।
भोर होते ही मां के भक्त नंगे पैर मंदिर में जल, फल, फूल, पत्र एवं प्रसाद लेकर पहुंचते है
कहा जाता है कि पवई नगर के नगायच परिवार के भागीरथ प्रसाद नगायच और पत्नी श्रीमती देवी नगायच ,वह प्रतिदिन पहाड़ी पर चढ़कर माता कलेही की पूजा करने के लिए जाती थी,| जब बह व्रद्ध हो गई तो उन्हें पहाड़ चढ़ने में परेशानी होती थी जिसकी वजह से उन्होंने एक दिन माता से प्रार्थना की कि वह अब यहां आने में असमर्थ है,तो माता ने उनसे कहा कि तू आगे आगे चल पीछे मुड़कर नहीं देखना जहां तू पीछे मुड़कर देखेगी मैं वही विराजमान हो जाऊंगी, इस तरह पतने नदी के पास पहुंचते ही जब माता की पैरों की आवाज आना बंद हो गई तो देवी नगायच ने पीछे मुड़कर देखा और माता का विग्रह वहीं पर विराजमान हो गया,उसके बाद भागीरथ नगायच के द्वारा वहा मंदिर बनवाया गया और आज  परिवार सुख समृद्धि से भरपूर है कलेही माता को चलित प्रतिमा माना जाता है
शारदेय नवरात्रि हो या फिर चैत्र नवरात्रि में जवारे बोए जाते हैं एवं उनकी पूजा की जाती है ओर विसर्जित किए जाते है |

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