

बीना। बीना रिफाइनरी के आसपास लागू कथित 5 किलोमीटर विकास निषिद्ध क्षेत्र और एक किलोमीटर निषिद्ध क्षेत्र के आधार, सुरक्षा अध्ययन तथा मंत्रालयीय अनुमोदन को लेकर सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 7 अक्टूबर 2026 को भेजे अपने नवीन उत्तर में अनेक बिंदुओं पर “सूचना उपलब्ध नहीं” बताया है, जबकि बीना रिफाइनरी में समय-समय पर हुए चार सुरक्षा ऑडिट तथा बफर सेफ्टी जोन संबंधी समिति की जानकारी स्वीकार की है।
अधिवक्ता महेंद्र कुमार नवैया द्वारा आरटीआई आवेदन के माध्यम से पूछा गया था कि कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी सागर के 31 मार्च 2009 के आदेश के तहत बीना रिफाइनरी के चारों ओर एक किलोमीटर निषिद्ध क्षेत्र तथा पांच किलोमीटर विकास निषिद्ध क्षेत्र घोषित करने से पहले केंद्र सरकार अथवा पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा कोई निर्देश, स्वीकृति, सुरक्षा अध्ययन, जोखिम मूल्यांकन या नीति जारी की गई थी या नहीं। साथ ही संबंधित पत्राचार, मानचित्र, समीक्षा रिपोर्ट एवं अन्य अभिलेख भी मांगे गए थे।
प्रथम उत्तर से संतुष्ट नहीं होने पर नवैया ने प्रथम अपील प्रस्तुत की थी। प्रथम अपीलीय अधिकारी ने 30 सितंबर 2026 को केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी को उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर आरटीआई आवेदन का बिंदुवार उत्तर देने के निर्देश दिए। इसके बाद मंत्रालय ने 7 अक्टूबर को नया उत्तर जारी किया।
नवीन उत्तर में कई प्रश्नों के सामने सीधे “सूचना उपलब्ध नहीं” लिखा गया है। हालांकि मंत्रालय ने बताया कि ऑयल इंडस्ट्री सेफ्टी डायरेक्टोरेट (OISD) पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस प्रतिष्ठानों की सुरक्षा ऑडिट करता है और बीना रिफाइनरी में 8 अक्टूबर 2012, 27 सितंबर 2016, 21 मार्च 2020 तथा 28 अगस्त 2023 को चार सुरक्षा ऑडिट किए गए। इस जानकारी से यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि वर्ष 2009 में पांच किलोमीटर का विकास प्रतिबंध लागू करते समय कौन-सा तकनीकी अथवा सुरक्षा अध्ययन आधार बनाया गया था।
मंत्रालय ने यह भी बताया है कि एम.बी. लाल समिति ने अधिक जोखिम वाले पेट्रोलियम एवं पेट्रोकेमिकल प्रतिष्ठानों के आसपास बफर सेफ्टी जोन की सिफारिश की थी। इसके अलावा 12 जनवरी 2026 को पूर्व से गठित एक उद्योग समिति के कार्यक्षेत्र को बफर सेफ्टी जोन की आवश्यकताओं की समीक्षा तक विस्तारित किया गया। हालांकि उक्त समिति की रिपोर्ट एवं सिफारिशें सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1)(a) का उल्लेख करते हुए उपलब्ध नहीं कराई गईं।
अधिवक्ता नवैया का कहना है कि मामला हजारों स्थानीय नागरिकों, किसानों, भूमि स्वामियों और क्षेत्र के विकास से जुड़ा है। यदि पांच किलोमीटर का प्रतिबंध किसी तकनीकी अध्ययन अथवा केंद्र सरकार की नीति पर आधारित था तो वह रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए। उन्होंने अब केंद्रीय सूचना आयोग में द्वितीय अपील प्रस्तुत कर सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट, जोखिम मूल्यांकन, बफर सेफ्टी जोन समिति की रिपोर्ट तथा वर्ष 2009 के निर्णय से जुड़े मूल अभिलेख उपलब्ध कराने की मांग करने की बात कही है।







