नगरपालिका की ता-ता थैया … खूब मची है खा-खा खैया …

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जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की मिलीभगत से विकास के चांद पर दाग
बीना नगरपालिका में विकास और सौंदर्य के नाम पर करोड़ों रुपए बर्बाद किए जा रहे हैं, बीना के वार्डों में जो निर्माण कार्य हो रहे हैं वे दोयम दर्जे के घटिया कार्य किए जा रहे हैं। इन कार्यों की जांच के लिए सत्ता पक्ष के ही पार्षद बीडी रजक बीना सीएमओ राहुल कौरव को पत्र दे चुके हैं, साधारण सभा की बैठकों में नेता प्रतिपक्ष प्रशांत राय सहित सत्ता पक्ष के अधिकांश पार्षद नगरपालिका के भ्रष्टाचार पूर्ण कार्यों पर हंगामा कर चुके हैं किंतु नगरपालिका के जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को उच्च स्तर का संरक्षण प्राप्त है, लिहाजा विरोध करने वालों की आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह दबकर रह जाती है। पूर्व में सीएमओ राहुल कौरव की गतिशीलता और कार्यशैली को देखते हुए ऐसा लगने लगा था कि नगरपालिका को संभालने पूर्व सीएमओ सुलेखा जाटव रूप बदलकर आ गई हों किंतु भ्रष्टाचार की वैतरणी में सभी डुबकी लगाने में जुट गए हैं। पूरे शहर को जगह-जगह खोदकर रख दिया है, ओवर ब्रिजों पर लाखों रुपए की रंगीन लाइट खराब हो चुकी है, तिराहों-चौराहों पर फव्वारे अब दिखाई नहीं दे रहे, शहर में डामरीकरण के नाम पर आधा-अधूरा काम छोड़ दिया गया है। उस पर भी आलम यह है कि विधायक निर्मला सप्रे, नगरपालिका अध्यक्ष लता सकवार, सीएमओ राहुल कौरव वार्डों के निरीक्षण की फोटो सोशल मीडिया पर डालकर जनता की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। बीना सीएमओ के स्थानांतरण को लेकर जो लता सकवार नगरपालिका संचालनालय भोपाल पहुंची थी उनका स्थानांतरण विधायक निर्मला सप्रे द्वारा रुकवा दिया गया। इतना ही नहीं नगरपालिका में पार्षदों के अलग-अलग गुट चल रहे हैं, जिनमें नपाध्यक्ष गुट, विधायक गुट, सीएमओ गुट और नपा उपाध्यक्ष गुट आपस में भिड़ते देखे जा सकते हैं। कुल मिलाकर बीना नगरपालिका का भगवान ही मालिक है, चारों ओर नगरपालिका की ता-ता थैया, और खूब मची है खा-खा खैया के चर्चे आम हो गए हैं।
बीना (टीएमई न्यूज)। नगरपालिका और नगरीय निकाय चुनावों के लिए मात्र एक साल का समय शेष बचा है, किंतु बीना नगरपालिका के जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को इस चीज से कोई मतलब नहीं है। कहते हैं कि जब पद और दायित्व भीख में मिल जाते हैं तो उसकी कोई कीमत नहीं होती। यही हाल इन दिनों बीना नगरपालिका का भी है। बीना नगरपालिका में करोड़ों रुपए के विकास कार्य और सौंदर्यकरण के लिए जो बड़ी-बड़ी राशियां जनता के टैक्सों के माध्यम से शासन द्वारा भेजी गई हैं उनका भरपूर दुरुपयोग बीना नगरपालिका में देखने को मिल रहा है। यदि ये कहा जाए कि बीना नगरपालिक को दो-तीन अधिकारी, दो-तीन नेता और दो-तीन जनप्रतिनिधि मिलकर चला रहे हैं तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। बीना नगरपालिका के विकास का यदि भौतिक सत्यापन करा लिया जाए तो रुपए में 40 पैसे का काम भी हकीकत की धरातल पर नजर नहीं आएगा। सत्ता पक्ष के अधिकांश पार्षद अपने-अपने वार्डों की ठेकेदारी में लिप्त हैं और इनका दबाव स्थानीय जनप्रतिनिधियों के माध्यम से अधिकारियों पर बना हुआ है। बीना शहर में सौंदर्यकरण और विकास के नाम पर नित प्रतिदिन कोई न कोई नया काम शुरू तो होता है किंतु वह खत्म कब हुआ और उसका जनता को क्या लाभ हुआ यह जानने की कोई भी कोशिश नहीं करता।
विधायक और नपाध्यक्ष के बीच चलती है नूरा-कुश्ती –
विधायक और नगरपालिका अध्यक्ष के बीच की नूरा कुश्ती सोशल मीडिया और अखबारों में तो दिखाई देती है किंतु वास्तविकता में इनकी मित्रता एक मिसाल बन चुकी है। विधायक निर्मला सप्रे ने नगरपालिका के विकास कार्यों में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं को लेकर आज तक कोई शिकायत किसी भी फोरम पर दर्ज नहीं कराई है यहां तक कि जन्मदिवस कार्यक्रमों में नगरपालिका अध्यक्ष फूलों का सबसे बड़ा गुलदस्ता लेकर शहर के एक रिसोर्ट में सबसे पहले विधायक का स्वागत करने पहुंचती हैं। जनता को यह संदेश दिया जाता है कि नगरपालिका के भ्रष्टाचार से विधायक नाराज हैं किंतु सूत्र बताते हैं कि नपाध्यक्ष के संरक्षक और और विधायक के करीबी के बीच भोपाल में विकास कार्यों को लेकर पैक्ट हो चुका है और उसी रणनीति पर बीना के विकास कार्य गुणवत्ताहीन और दोयमदर्जे के हो रहे हैं।
डामरीकरण के बाद सडक़ें ऊंची नीची, होती हैं दुर्घटनाएं –
शहर में जो डामरीकरण हुआ है उस डामरीकरण की गंभीरता कितनी है, उसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संबंधित ठेकेदार जिसके सत्ता पक्ष से अच्छे संबंध हैं उसने बीच-बीच में कई जगह डामरीकरण पूर्ण ही नहीं किया, जिस कारण से शहर के मुख्य मार्गों की सडक़ कहीं ऊंची कहीं नीची होने के कारण आए दिन दोपहिया वाहन दुर्घटनाग्रस्त होते रहते हैं। स्टेशन रोड से लेकर इटावा तक डिवाइडर के दोनों ओर कई जगह पर सडक़ बनाई नहीं गई हैं, जो डिवाइडरों के बीच के रास्ते हैं वहां भी डामरीकरण नहीं किए जाने से दुर्घटनाओं का भय बना रहता है।
डिस्को लाइट बने सिग्रल : सिग्रलों के नीचे लगने लगी सब्जी मंडी –
बीना नगरपालिका की सबसे बड़ी हास्यास्पद स्थिति यह है कि यहां लगभग 300 मीटर की समानांतर दूरी पर बड़े-बड़े सिग्रल लगा दिए गए हैं और उन सिग्रलों के नीचे नगरपालिका अधिकारियों की कृपा से अवैध रूप से सब्जी मंडी भी चालू करा दी गई है, जो अधिकारी अतिक्रमण हटाने के नाम पर पूर्व विधायक महेश राय से भिड़ गए थे वे अब इस नई कथित मंडी को लेकर शांत बने हुए हैं।
ट्रैफिक पुलिस ही नहीं, लाल-नीली-पीली कौन देखेगा –
सिग्रल को लेकर वाहवाही तो खूब लूटी गई किंतु वे अभी तक चालू नहीं हो पाए हैं क्योंकि उन्हें चालू कराना यातायात पुलिस का काम है और बीना में यातायात पुलिस के नाम पर दो या तीन पुलिसकर्मी ही तैनात हैं। सिग्रल सिर्फ इसलिए लगाए गए ताकि लाखों रुपए का भ्रष्टाचार हो सके। बीना में ट्रैफिक व्यवस्था इतनी लचर है कि लाल-पीली-नीली कोई भी लाइट जलाओ किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि लोग इसको डिस्को लाइट समझकर चौराहो पर बजने वाले गीतों पर थिरकना शुरू हो जाएंगे। बीना का विकास क्यों हो रहा है, कैसे हो रहा है, कैसे होना चाहिए इस बात की फिक्र किसी को नहीं है। सबको अपनी-अपनी जेबों को और अपने-अपने पर्स की चिंता सताती रहती है।
बीना सीएमओ से बड़ा सवाल?
एक कॉलोनी को तोड़ दिया, बाकी 64 क्या वैध हो गईं –
बीना में 65 कॉलोनियों को नोटिस दिए गए थे क्योंकि ये सब अवैध थी, इनमें से एक कॉलोनी को सांकेतिक रूप से तोड़ा गया, शेष 64 कॉलोनियां क्या अब वैध हो गई हैं या फिर सीएमओ साहब पर कोई बड़ा सा दबाव आ गया है, अभी यह कहना मुश्किल होगा कि आगे के समय में सभी अवैध कॉलोनियों पर बीना सीएमओ अपनी पुरानी सिंघम स्टाइल में काम करेंगे या फिर सत्ता और संगठन के बोझ में दबकर अपनी असली शैली को खो देंगे। चर्चा तो यह भी है कि सीएमओ साहब जिस कॉलोनी को तोडऩे जाते हैं वहां से चाय-पानी के ऑफर देते हुए वीडियो वायरल होने लगते हैं। सभी जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों को यह समझना होगा कि शहर उनका है, विकास कार्य उनके कार्यकाल में हो रहे हैं और जनता सबकुछ जानती है बस वह मौके पर चौका लगाती है। दतिया के चुनाव इस बात के साक्षी हैं। दो साल बाद विधायक के चुनाव और एक साल बाद नगरपालिका के चुनाव होना शेष हैं और हर बार नगरपालिका और जनपद के पद भीख में नहीं मिलते।

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