टुडे एमपी एक्सप्रेस….
बीना नगर गौरव महोत्सव या सवालों से बचने का उत्सव?

बीना में नगर गौरव महोत्सव फिर सज-धजकर तैयार है। मंच सजेगा, रोशनी होगी, कलाकार आएंगे, गीत-संगीत होगा और शहर कुछ घंटों के लिए झूमेगा। लेकिन सवाल यह है कि जिस शहर के नाम पर यह गौरव महोत्सव मनाया जा रहा है, उस शहर की हालत पर गौरव आखिर किस बात का किया जाए?
नगर गौरव महोत्सव की परंपरा बुरी नहीं है। शहर को उत्सव चाहिए, संस्कृति चाहिए, मनोरंजन चाहिए और अपनी पहचान पर गर्व करने के अवसर भी चाहिए। लेकिन उत्सव तभी सार्थक लगता है, जब उसके पीछे शहर के विकास की ठोस तस्वीर भी दिखाई दे। बीना में तस्वीर कुछ उलटी दिखाई देती है—सड़कें सवाल पूछ रही हैं, यातायात व्यवस्था जवाब मांग रही है और विकास के नाम पर खर्च हुए पैसे हिसाब मांग रहे हैं।
शहर की सड़कों का हाल किसी से छिपा नहीं है। कहीं डामर है तो कहीं गड्ढे हैं। कहीं सड़क बनी है तो आगे जाकर सड़क जैसे गायब हो जाती है। नागरिक रोज इन रास्तों पर चलते हैं और शायद यही उनका रोज का ‘नगर गौरव’ है।
सौंदर्यीकरण के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च कर हरी, नीली और पीली रोशनी वाली लाइटें लगाई गईं। ट्रैफिक सिग्नल तक को नया रूप देने की कोशिश हुई, लेकिन सवाल यह है कि जब लाइटें ही नहीं जलेंगी तो शहर की चमक किस काम की? बीना को रोशनी का बजट मिला, लेकिन रोशनी नसीब नहीं हुई।
शहर के दोनों ओवरब्रिज पर तिरंगे रंग की लाइटें लगाकर बीना को सुंदर बनाने का सपना दिखाया गया था। लेकिन महज करीब 11 महीने में आधे से ज्यादा लाइटों का खराब हो जाना इस पूरे सौंदर्यीकरण की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। आखिर इतनी जल्दी लाइटें क्यों बुझ गईं? किस कंपनी ने काम किया? क्या गारंटी थी? रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है? और सबसे बड़ा सवाल—जनता के पैसे से हुए काम का हिसाब जनता को कौन देगा?
यातायात व्यवस्था की हालत भी किसी से छिपी नहीं है। जाम, अव्यवस्था और बेतरतीब यातायात के बीच शहर चल रहा है। दूसरी ओर सब्जी बेचने वाले, फल के ठेले लगाने वाले और छोटे-छोटे कारोबार के जरिए अपने परिवार का पेट पालने वाले लोगों पर कार्रवाई और बेदखली की तलवार लटकती रहती है।
व्यवस्था ऐसी हो गई है कि बड़े विकास के बोर्ड लगाने में शहर को कोई परेशानी नहीं, लेकिन छोटे आदमी की रोजी-रोटी के लिए जगह तलाशना मुश्किल है।
राजनीति का अपना रंग है। भाजपा और कांग्रेस की राजनीति में इधर से उधर खिसकते रहने वाले कुछ चेहरे अभी भी अपना स्थायी राजनीतिक ठिकाना तलाश रहे हैं। जनता भी शायद सोच रही है कि विकास का पाला कौन चुनेगा और राजनीति का पाला कौन?
शहर के विकास कार्यों में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार को लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं और आरटीआई लगाने वाले एक्टिविस्टों की फाइलें लगातार मोटी होती जा रही हैं। सवाल उठते हैं, आवेदन लगते हैं, दस्तावेज जुटते हैं, लेकिन जवाबदेही का वह मजबूत तंत्र दिखाई नहीं देता जिसकी लोकतंत्र में अपेक्षा की जाती है।
और नगर पालिका नेतृत्व पर भी सवाल कम नहीं हैं। चार साल के कार्यकाल में यदि नगर पालिका अध्यक्ष जनता और मीडिया के सामने खुलकर नियमित पत्रकार वार्ता नहीं कर सकीं, तो सवाल स्वाभाविक है—आखिर जवाब देने से इतना परहेज क्यों?
जनप्रतिनिधि का पद सिर्फ उद्घाटन, भूमिपूजन और मंच पर माल्यार्पण करने के लिए नहीं होता। जनता के सवाल सुनना, पत्रकारों के सवालों का जवाब देना और अपने कार्यकाल का हिसाब देना भी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है।
लेकिन नगर गौरव महोत्सव में इन सवालों की आवाज शायद संगीत के शोर में दब जाएगी।
बड़े कलाकार बुलाए जाएंगे। मंच सजेगा। लोग नाचेंगे। कलाकार गाएंगे, नचाएंगे और शहर तालियां बजाएगा। कुछ घंटों के लिए गड्ढे दिखाई नहीं देंगे, बंद पड़ी लाइटें याद नहीं आएंगी, यातायात की अव्यवस्था पर चर्चा नहीं होगी और छोटे दुकानदारों की परेशानी भी शायद मनोरंजन की भीड़ में खो जाएगी।
मगर महोत्सव खत्म होने के बाद शहर फिर वहीं होगा—उन्हीं सड़कों पर, उन्हीं गड्ढों के बीच, उन्हीं बुझी लाइटों के नीचे और उन्हीं सवालों के साथ।
नगर गौरव महोत्सव का बजट कितना है? किस मद में कितना खर्च होगा? कलाकारों को कितना भुगतान होगा? आयोजन में किसे-किसे ठेका मिलेगा? मंच, लाइट, साउंड, प्रचार और अन्य व्यवस्थाओं पर कितना खर्च होगा? इन सबका सार्वजनिक हिसाब होना चाहिए।
क्योंकि जनता को महोत्सव से आपत्ति नहीं है। आपत्ति तब होती है जब उत्सव पर पैसा खर्च करने से पहले विकास के जरूरी सवालों को किनारे कर दिया जाए।
बीना को गौरव महोत्सव चाहिए, लेकिन उससे पहले बीना को गौरव करने लायक शहर चाहिए।
ऐसा शहर, जहां सड़क आधी पक्की और आधी गड्ढों में न हो।
ऐसा शहर, जहां करोड़ों की लाइटें सिर्फ उद्घाटन के दिन न चमकें।
ऐसा शहर, जहां ओवरब्रिज की तिरंगी रोशनी 11 महीने में दम न तोड़े।
ऐसा शहर, जहां यातायात व्यवस्था पटरी पर हो।
ऐसा शहर, जहां गरीब का ठेला विकास की राह में सबसे बड़ा अपराध न बन जाए।
और ऐसा नगर पालिका प्रशासन, जो जनता और पत्रकारों के सवालों से आंख मिलाकर जवाब दे।
वरना नगर गौरव महोत्सव नहीं, यह सिर्फ ‘नगर गौरव के नाम पर महोत्सव’ बनकर रह जाएगा।
मंच पर रोशनी चाहे जितनी कर दी जाए,
शहर के सवालों का अंधेरा जवाब के बिना दूर नहीं होगा।
और याद रखिए—
महोत्सव की रोशनी कुछ घंटों की होती है, लेकिन विकास का हिसाब जनता वर्षों तक मांगती है।





