संपादकीय -राजेन्द्र सिंह जादौन

देश के सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने राज्यसभा में एक ऐसा आँकड़ा रखा जिसने पूरे देश को सोचने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने बताया कि भारत में हर वर्ष लगभग 1.80 लाख लोग सड़क दुर्घटनाओं में अपनी जान गंवा देते हैं। यह संख्या किसी साधारण सरकारी रिपोर्ट का हिस्सा नहीं है, बल्कि उन लाखों परिवारों की पीड़ा का दस्तावेज़ है जिनके घर का कोई सदस्य सुबह निकला और फिर कभी लौटकर नहीं आया।
यह आँकड़ा कई सवाल खड़े करता है। पिछले एक दशक में भारत ने सड़क निर्माण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार हुआ, नए एक्सप्रेस-वे बने, सुरंगें और फ्लाईओवर तैयार हुए तथा सड़क अवसंरचना को विकास का प्रमुख आधार माना गया। इन परियोजनाओं के साथ टोल व्यवस्था भी लगातार बढ़ी। जनता ने यह सोचकर टोल देना स्वीकार किया कि यदि बेहतर सड़कें मिलेंगी, सुरक्षित यात्रा होगी और समय बचेगा, तो यह भुगतान उचित है।
लेकिन आज जब सड़क दुर्घटनाओं में हर वर्ष लगभग 1.80 लाख लोगों की मृत्यु हो रही है, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या सड़क निर्माण के साथ सड़क सुरक्षा भी उसी गति से बढ़ी है?
टोल टैक्स केवल सड़क पर चलने का शुल्क नहीं है। यह नागरिक और व्यवस्था के बीच एक भरोसे का समझौता भी है। नागरिक अपनी जेब से भुगतान करता है और बदले में यह अपेक्षा करता है कि उसे सुरक्षित, व्यवस्थित और मानकों के अनुरूप सड़क मिलेगी। यदि कहीं गड्ढे हैं, संकेतक स्पष्ट नहीं हैं, दुर्घटना संभावित स्थानों का समय पर सुधार नहीं होता, अवैध कट बने रहते हैं या रखरखाव में लापरवाही होती है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों के मन में प्रश्न उठते हैं।
हालाँकि यह भी स्वीकार करना होगा कि सड़क दुर्घटनाओं का कारण केवल सड़कें नहीं होतीं। सड़क सुरक्षा एक साझा जिम्मेदारी है। तेज़ रफ्तार, शराब पीकर वाहन चलाना, मोबाइल फोन का उपयोग, हेलमेट और सीट बेल्ट की अनदेखी, गलत दिशा में वाहन चलाना, थकान की स्थिति में ड्राइविंग तथा ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन भी बड़ी संख्या में दुर्घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए पूरी जिम्मेदारी केवल सरकार या सड़क निर्माण एजेंसियों पर डालना उचित नहीं होगा।
लेकिन सरकार और संबंधित एजेंसियों की जिम्मेदारी इसलिए अधिक है क्योंकि नीति बनाना, सड़क डिज़ाइन तय करना, सुरक्षा मानकों का पालन कराना, रखरखाव सुनिश्चित करना और कानून लागू कराना उनके अधिकार क्षेत्र में आता है। यदि व्यवस्था अपने हिस्से की जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी से निभाए और नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करें, तभी दुर्घटनाओं में वास्तविक कमी लाई जा सकती है।
आज भारत में कई राष्ट्रीय राजमार्ग विश्वस्तरीय हैं, लेकिन सड़क सुरक्षा का मूल्यांकन केवल सड़क की चौड़ाई या निर्माण लागत से नहीं होना चाहिए। असली पैमाना यह होना चाहिए कि उस सड़क पर यात्रा करने वाला व्यक्ति कितनी सुरक्षा के साथ अपने घर पहुँचता है। यदि किसी सड़क पर बार-बार दुर्घटनाएँ हो रही हैं, तो उस स्थान का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए। ब्लैक स्पॉट की पहचान कर तत्काल सुधार होना चाहिए। जहाँ आवश्यकता हो वहाँ स्पीड कंट्रोल, बेहतर प्रकाश व्यवस्था, रिफ्लेक्टर, चेतावनी संकेत और सुरक्षा बैरियर लगाए जाने चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण पहलू दुर्घटना के बाद की व्यवस्था है। कई बार दुर्घटना में घायल व्यक्ति समय पर चिकित्सा सहायता नहीं मिलने के कारण अपनी जान गंवा देता है। यदि एम्बुलेंस सेवा, ट्रॉमा सेंटर और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली अधिक प्रभावी हो, तो अनेक जीवन बचाए जा सकते हैं। इसलिए सड़क सुरक्षा केवल दुर्घटना रोकने तक सीमित नहीं है, बल्कि दुर्घटना के बाद त्वरित सहायता उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
टोल वसूली की व्यवस्था आज अत्यंत व्यवस्थित और तकनीक आधारित हो चुकी है। फास्टैग के माध्यम से भुगतान कुछ ही सेकंड में हो जाता है। यदि भुगतान में कोई त्रुटि हो, तो उसका रिकॉर्ड तुरंत उपलब्ध हो जाता है। यह दक्षता सराहनीय है। लेकिन नागरिक यह भी अपेक्षा करता है कि सड़कों के रखरखाव, सुरक्षा ऑडिट और दुर्घटना संभावित स्थानों के सुधार में भी उतनी ही तत्परता दिखाई दे।
भारत जैसे विशाल देश में सड़क परिवहन आर्थिक विकास की रीढ़ है। उद्योग, व्यापार, पर्यटन और कृषि सभी सड़क नेटवर्क पर निर्भर हैं। इसलिए सड़कों का निर्माण आवश्यक है और टोल व्यवस्था भी कई परियोजनाओं के वित्तपोषण का एक माध्यम है। लेकिन किसी भी व्यवस्था की सफलता केवल आर्थिक मॉडल से नहीं, बल्कि उसके सामाजिक परिणामों से भी मापी जाती है।
सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतें केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना पर भी गहरा प्रभाव डालती हैं। परिवारों की आय समाप्त हो जाती है, बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। इसलिए सड़क सुरक्षा को केवल परिवहन विभाग का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकता माना जाना चाहिए।
सरकार ने सड़क सुरक्षा के क्षेत्र में अनेक पहलें भी की हैं। मोटर वाहन कानून में संशोधन, हेलमेट और सीट बेल्ट को लेकर जागरूकता अभियान, ब्लैक स्पॉट सुधार और आधुनिक राजमार्गों का निर्माण ऐसे प्रयास हैं जिनके सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। इन प्रयासों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है ताकि सड़क दुर्घटनाओं में निरंतर कमी लाई जा सके।
नागरिकों की भी भूमिका कम महत्वपूर्ण नहीं है। यदि हम स्वयं ट्रैफिक नियमों का पालन नहीं करेंगे, गति सीमा का सम्मान नहीं करेंगे और सड़क को अनुशासन के बजाय प्रतियोगिता का मैदान समझेंगे, तो कोई भी सड़क हमें सुरक्षित नहीं रख सकती। सड़क सुरक्षा कानून का विषय होने के साथ-साथ सामाजिक संस्कृति का भी विषय है।
आज आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व की है। सरकार को सड़क निर्माण के साथ सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। निर्माण एजेंसियों को गुणवत्ता और रखरखाव पर लगातार ध्यान देना होगा। पुलिस को निष्पक्ष और प्रभावी प्रवर्तन सुनिश्चित करना होगा। वहीं नागरिकों को भी यह समझना होगा कि कुछ मिनट बचाने की जल्दबाज़ी जीवनभर का नुकसान बन सकती है।
देश की प्रगति चौड़ी सड़कों से अवश्य दिखाई देती है, लेकिन उसकी वास्तविक सफलता उन नागरिकों से मापी जाती है जो सुरक्षित अपने घर लौटते हैं। यदि टोल के माध्यम से जनता विकास में भागीदार बन रही है, तो व्यवस्था का भी दायित्व है कि वह उस विश्वास को बनाए रखे।
सड़कें केवल शहरों और राज्यों को नहीं जोड़तीं, वे परिवारों, सपनों और भविष्य को भी जोड़ती हैं। इसलिए हर सड़क, हर पुल और हर राजमार्ग का अंतिम उद्देश्य केवल दूरी कम करना नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा करना होना चाहिए।
आख़िरकार, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिक कर इसलिए नहीं देता कि उसे केवल सुविधाओं का वादा मिले, बल्कि इसलिए देता है कि उसे गुणवत्तापूर्ण और सुरक्षित सार्वजनिक सेवाएँ प्राप्त हों। सड़कें विकास का प्रतीक हैं, पर उनकी सबसे बड़ी सफलता तब होगी जब सड़क पर निकलने वाला हर नागरिक यह विश्वास लेकर चले कि उसकी मंज़िल केवल नक्शे पर नहीं, बल्कि सुरक्षित रूप से उसके घर तक भी पहुँचेगी।
जब तक यह विश्वास पूरी तरह स्थापित नहीं होता, तब तक सड़क सुरक्षा पर हर चर्चा अधूरी रहेगी। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी उपलब्धि उसके राजमार्गों की लंबाई नहीं, बल्कि उन राजमार्गों पर सुरक्षित बचाई गई ज़िंदगियाँ होती हैं।








