
दतिया उपचुनाव के परिणाम यह सभी के लिए आत्ममंथन का विषय हैं, पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा के कुछ समर्थकों की नाराजग़ी भी इस चुनाव परिणाम को प्रभावित करने वाले कारणों में से एक रही, टिकट वितरण के बाद कई स्थानों पर असंतोष सार्वजनिक रूप से सामने आया और कुछ कार्यकर्ताओं ने अपने पदों से इस्तीफे दिए तथा विरोध-प्रदर्शन भी किए। किसी भी लोकतांत्रिक दल की सबसे बड़ी ताकत उसके कार्यकर्ता होते हैं, यदि कार्यकर्ता मतदान के दिन पूरी शक्ति से मैदान में उतरें, तो परिणाम भी अलग हो सकते हैं। 11 वें राउण्ड तक 13 हजार वोटों से बढ़त बनाने के बावजूद कुंवर घनश्याम सिंह को 6056 वोटों की जीत तक सिमट गए। यदि 2 राउण्ड और होते तो शायद यह जीत हार में भी बदल सकती थी। कांग्रेस की इस जीत के पहले पूर्व विधायक राजेन्द्र भारती का पार्टी से निष्कासन और चुनाव परिणाम के बाद पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के बूथ से भाजपा की हार की चर्चाएं भी राजनैतिक समीक्षकों को सोचने पर विवश कर रही हैं। बहरहाल कांग्रेस में जीत का जश्न है और भाजपा में पराजय की खामोशी। इस चुनाव परिणाम को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के सत्ता व संगठन के असंतुलन के रूप में भी देखा जा रहा है। फिलहाल मुख्यमंत्री की राह का एक बड़ा रोड़ा हट गया है, अब शायद नरोत्तम मिश्रा के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग की जा सकती है जैसा कि भाजपा के हारे हुए प्रत्याशी आशुतोष तिवारी ने अपनी प्रतिक्रिया में कह दिया है कि जो लोग भाजपा को अपनी माँ कहते थे उन्होंने धोखा दिया है। आशुतोष तिवारी का यह वक्तव्य कहीं न कहीं नरोत्तम मिश्रा और उनके कई समर्थकों जो पार्टी पदाधिकारी भी हैं की ओर एक इशारा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने भी स्पष्ट रूप से कह दिया है कि हमें नरोत्तम मिश्रा का साथ और सहयोग मिला। उनकी इस टिप्पणी के बाद नरोत्तम मिश्रा का कोई बयान अभी तक सिंघार के विरोध में नहीं आया है। ऐसा माना जा सकता है कि दतिया में नरोत्तम मिश्रा ने अपनी ताकत अपने आँसुओं के माध्यम से दिखा दी है। अब इसे जेन-जी के आंदोलन की परिणति माना जाए या फिर भितरघात। फिलहाल कांग्रेस जीत चुकी है और अब वह ईव्हीएम पर ठीकरा नहीं फोड़ सकती।







